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चंपारण के सौ साल: कैसे भूल सकते हैं महात्मा गांधी के सत्याग्रह को

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अतुल्य विरासत को अजर-अमर बनाने की दिशा में जो प्रयास हो रहे हैं, वे न सिर्फ सराहनीय हैं, बल्कि प्रेरणादायक भी हैं। पिछले दिनों बिहार सरकार ने गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह की सौवीं वर्षगांठ मनाने का फैसला एक सर्वदलीय बैठक में किया। महात्मा के नाम पर राजनीतिक मतभेद न होना, इस बड़े फैसले का सुखद पहलू रहा। 10 अप्रैल, 1917 को पहली बार महात्मा गांधी बिहार आए थे।

यही वह दिन था, जब 48 वर्षीय मोहनदास करमचंद गांधी नील के खेतिहर राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर बांकीपुर स्टेशन (अब पटना) पहुंचे थे। उस समय अंग्रेजों द्वारा जबरन नील की खेती कराई जा रही थी। स्थानीय किसानों को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए शुक्लाजी ने गांधीजी से अपील की थी कि वह इस मुद्दे पर आंदोलन की अगुवाई करें। उनकी अगुवाई वाले इस आंदोलन से न सिर्फ नील के किसानों की समस्या का त्वरित हल हुआ, बल्कि सत्य, अहिंसा और प्रेम के संदेश ने फिरंगियों के विरुद्ध भारतीयों को एकजुट किया।

यह सच है कि गांधीजी को देश का बच्चा-बच्चा जानता है, परंतु उनसे और उनके योगदान से जुड़े कई तथ्य ऐसे हैं, जिन्हें हम भुलाते जा रहे हैं। चूकि चंपारण सत्याग्रह की भूमि बिहार से जुड़ी है, इसलिए यह लाजिमी था कि बिहार सरकार पूरी तत्परता, जिम्मेदारी और सम्मान के साथ इसकी शताब्दी मनाने की तैयारी करती।

बिहार की धरती में सत्याग्रह का आगाज

वैसे, इस आयोजन की महत्ता इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यही वह मौका था, जब देश को सत्याग्रह रूपी एक मजबूत हथियार हासिल हुआ था। सत्याग्रह गांधीजी का दिया वह हथियार है, जिसमें दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से लोहा लेने की ताकत निहित थी। इसने मृण्मय भारत को चिन्मय भारत बनाने के सपने को संजो रखा था।

बीसवीं शताब्दी में भारत समेत दुनिया के कई मुल्कों के लोगों के लिए महात्मा गांधी के सत्याग्रही औजार धर्म, अधिकार व कर्तव्य बन चुके थे। इनके साथ शर्त यह थी कि इन औजारों में सविनय और अहिंसा निहित हों। गांधी जी के भारत आगमन के बाद चंपारण का सत्याग्रह देश का पहला सत्याग्रह था। सत्य की राह पर चलकर असत्य का विरोध करने जैसी प्रतिज्ञा तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही ले ली थी। वैसे, वर्ष 1914 चंपारण के किसानों के लिए काफी अशुभ रहा।

वजह यह थी कि औद्योगिक क्रांति के बाद नील की मांग बढ़ जाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने भारतीय किसानों पर सिर्फ नील की खेती करने का दबाव डालना शुरू कर दिया। आंकड़ों की मानें, तो साल 1916 में लगभग 21,900 एकड़ जमीन पर आसामीवार, जिरात और तीनकठिया प्रथा लागू थी। चंपारण के रैयतों से मड़वन, फगुआही, दशहरी, सिंगराहट, घोड़ावन, लटियावन, दस्तूरी समेत लगभग 46 प्रकार के कर वसूले जाते थे। और वह कर वसूली भी काफी बर्बर तरीके से की जाती थी।
निलहों के खिलाफ चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल की अगुवाई में चल रहे तीन वर्ष पुराने संघर्ष को 1917 में मोहनदास करमचंद गांधी ने व्यापक आंदोलन का रूप दिया। आंदोलन की अनूठी प्रवृत्ति के कारण इसे न सिर्फ देशव्यापी, बल्कि उसके बाहर भी प्रसिद्धि हासिल हुई। गांधी के बिहार आगमन से पहले स्थानीय किसानों की व्यथा, निलहों का किसानों के प्रति अत्याचार और उस अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का इतिहास भले ही इतिहासकारों के दृष्टि-दोष का शिकार हो गया हो, लेकिन चंपारण के ऐतिहासिक दृश्यों में वह इतिहास आज भी संचित है।
15 अप्रैल, 1917 को महात्मा गांधी के मोतिहारी आगमन के साथ पूरे चंपारण में किसानों के भीतर आत्म-विश्वास का जबर्दस्त संचार हुआ। इस पहल पर गांधीजी को धारा-144 के तहत सार्वजनिक शांति भंग करने के प्रयास की नोटिस भी भेजी गई। चंपारण के इस ऐतिहासिक संघर्ष में डॉ राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी समेत चंपारण के किसानों ने अहम भूमिका निभाई।

Hindustan


 सांप्रदायिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है आतंकवाद

ऐसा लगता है कि वामपंथियों की घड़ी की सूई स्टालिन पर और सेक्युलरों की हिटलर पर आकर अटक गई है। शायद यही वजह है कि जाधवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राएं नारे लगा रहे हैं कि हिटलर के पिल्लों को एक धक्का और दो। कश्मीर मांगे आजादी। नगालैंड मांगे आजादी। मणिपुर मांगे आजादी। गौमाता के औलादों को एक धक्का और दो।

सेक्युलरों की आंखें आज भी नहीं खुली है। इतने धक्के खाने के बाद भी, आश्चर्य है। दुनिया स्टालिन और हिटलर के युग से बाहर निकल चुकी है। अब लादेन, बगदादी, हाफिज सईद और डॉक्टर जाकिर नाईक का जमाने में नाम है। खतरा इनसे है जमाने को। इनका जमाना कायम न हो जाए, यह कोशिश होनी चाहिए।

विश्व में सांप्रदायिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है विश्व आतंकवाद। आज विश्व आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा है बगदादी और सबसे संगठित शक्तिशाली संगठन है आईएसआईएस। इस सांप्रदायिकता का पोषण शीत युद्ध के गर्भाशय में हुआ है और पूरी दुनिया को तबाह कर रहा है।

शीतयुद्ध के समय अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए अमेरिका ने अरब के जिस हनफी विचारधारा को बढ़ावा दिया गया था और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी फौज की मदद से अलकायदा और लादेन को खड़ा किया गया था, उसी तालिबान ने आईएसआईएस का रूप ले लिया है। ओसामा बिन लादेन, बगदादी, हाफिज सईद आदि आदि उसी के चेहरे हैं।

सोवियत संघ का विघटन हो गया और सोवियत संघ के प्रभाव वाले तमाम मुस्लिम देशों में धार्मिक कट्टरता, उन्माद और सांप्रदायिकता में उभर आई, वही अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित हुआ। आज वही सारे जहां में सांप्रदायिक महाशक्ति के रूप में तांडव कर रहा है। इस सांप्रदायिकता के समानांनतर सारे संसार में अन्य सांप्रदायिकता की बयार बह रही है, जिन सांप्रदायिकताओं को फलने-फूलने का मौका नहीं मिला था, इन सांप्रदायिकता की नागफनी देश-दुनिया में लहलहा रही है। उदारता की कलियां कुम्हला रही हैं। उदारवादियों की हार हो रही है। उदारता का सूर्य अस्त हो रहा है और कट्टरता का उदय हो रहा है, उसी का आज दुनिया में सबसे बड़ा चेहरा हैं ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति।

अमेरिका में कट्टरता, सांप्रदायिकता और रंगभेद के नफरत का आलम यह है कि अब तक तीन भारतीय हिंदुओं को इसका शिकार होना पड़ा है। अमेरिकी सोच साफ है कि जो गोरा है, वह आतंकी नहीं और जो गोरा नहीं है, वह सब आतंकी हैं क्योंकि उनकी वेशभूषा, रंग-रूप, रहन-सहन एक जैसा है। अमेरिकी धर्म और सांप्रदायिकता के आधार पर भेद करना नहीं जानता। नतीजा, भारतीय हिंदू उसके लगातार शिकार हो रहे हैं। सांप्रदायिकता दुनिया के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वह दूसरे की वजूद को ही खत्म कर देना चाहता है। वह सह-आस्तित्व में यकीन नहीं रखता। आईएसआईएस, बगदादी और हाफिज सईद जैसे आतंकियों का यही नजरिया है। इनका नजरिया अमेरिकियों के नजरिए से अलग है। वह शिया और सुन्नी में भेद करना जानते हैं। वह मुस्लिम और हिंदू में भेद करना जानते हैं। हनफी और बहाबी विचारधारा वाले आतंकी तो सुन्नियों में भी भेद करना जानते हैं। वह बरेलवी और देवबंदी को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। वह बहावी के अलावा बाकी सारे यहूदी, ईसाई, शिया, सूफी, हिंदू, सिख, बौद्ध के वजूद को ही मिटा देने पर आमादा हैं। बोको-हराम के कारनामों को देखिए।

यहां से सांप्रदायिकता को देखिए तो नेहरू जमाने के नजरिए से सांप्रदायिकता की लड़ाई नहीं जीती जा सकती, यह जाहिर हो चुका है। नेहरू के जमाने का नजरिया था कि भारत में बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक होती है। गौरतलब है कि उस जमाने में इस्लामिक स्टेट का वजूद नहीं था। लादेन, बगदादी और हाफिज सईद जैसे खतरनाक आतंकियों का उदय नहीं हुआ था। इनके उदय के साथ अब अल्पसंख्यक की सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यक की सांप्रदायिकता नहीं रही। वह विश्व की सबसे बड़ी सांप्रदायिकता इस्लामिक स्टेट यानी आईएसआईएस से जुड़ चुकी है। इसलिए पुराने नजरिए से नए जमाने की चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता है।
देश में कांग्रेस और कम्युनिस्टों के सेक्युलरवाद की राजनीति का पतन जाने-अनजाने में इसी प्रकार की सांप्रदायिकता में हुई है। जैसे पिछड़े वर्ग की राजनीति का पतन यादववाद में और दलित वर्ग की राजनीति का पतन मोचीवाद में हुआ। इसलिए सांप्रदायिकता की लड़ाई लड़नेवाले यह तमाम लोग लगातार हार रहे हैं।

सांप्रदायिकता को सबसे पहले अब एक नए नजरिए से देखने और समझने की जरूरत है। एक नई रणनीति से सांप्रदायिकता के पराजय की पटकथा लिखनी होगी। लोकतंत्र को बचाने और सह-अस्तित्व और सद्भाव के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए एक नए सिरे से सोचने की जरूरत है ताकि लोकतंत्र बचे, लोग बचें, देश बचे, दुनिया बचे, मानवता बचे।

 ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं NBT


कैशलेस इकॉनमी का ब्लैकहोल

सरकार ने नगद लेनदेन की दो लाख रुपए की अधिकतम सीमा तय की है ताकि लोग अधिकाधिक कैशलेस लेन देन करें। इस कदम के पक्ष में पहला तर्क आर्थिक विकास का है। मास्टरकार्ड ने अनुमान लगाया है कि कैशलेस इकॉनमी से देश की आय में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। क्रेडिट कार्ड कंपनी वीजा ने इस लाभ का अनुमान 70 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष लगाया है। वस्तुस्थिति इसके ठीक विपरीत है। जब आप 2,000 रुपए नकद अपनी तिजोरी में रखते हैं तो इतनी ब्याज-मुक्त रकम रिजर्व बैंक को उपलब्ध कराते हैं। पांच साल बाद भी रिजर्व बैंक आपको 2000 रुपए ही वापिस करेगा। यदि आपने यह रकम रिजर्व बैंक की देखरेख में आने वाले किसी खाते में जमा कराई होती तो उसे आपको लगभग 2400 रुपए देने पड़ते। एक नोट छापने का खर्च 10 रुपए मान लें तो रिजर्व बैंक के लिए कैशलेस इकॉनमी भारी घाटे का सौदा है क्योंकि कैश पर ब्याज नहीं देना होता है।

अपराध नहीं रुकते
कैशलेस के पक्ष में दूसरा तर्क अपराध का है। वर्तमान में स्वीडन कैशलेस दिशा में अग्रणी है। इसी देश ने बोफोर्स का घोटाला किया था। लगभग 15 वर्ष पूर्व वर्ल्ड ट्रेड टावर पर अल कायदा के आक्रमण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने आतंक से जुड़े तमाम संदिग्ध खातों को फ्रीज कर दिया था। परन्तु इस्लामिक स्टेट ने फिर उससे भी अधिक सृदृढ़ वित्तीय व्यवस्था बना ली। कहावत है कि ताले शरीफों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नही। तात्पर्य यह कि अपराध में लिप्त लोग कैशलेस के तमाम विकल्प ढूढ़ लेंगे- जैसे सोना, हुंडी, हवाला इत्यादि।

कैशलेस के पक्ष में तीसरा तर्क काले धन का दिया जा रहा है। अमेरिका ने 1969 में 10,000, 5,000, 1,000 और 500 डॉलर के नोटों को निरस्त कर दिया था। इससे नगद डॉलर रखने का प्रचलन कम नहीं हुआ है। आज लगभग 1700 अरब डॉलर मूल्य के 100 डॉलर के नोट प्रचलन में हैं। इनका बड़ा हिस्सा विदेशों मे पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है। बड़े नोटों को निरस्त करने से काला धन कम नहीं हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में केवल 6 प्रतिशत काला धन नगद में रहता है। बिल्डरों के दफ्तर में आपको नकद कम ही मिलेगा। काला धन सोना, प्रॉपर्टी अथवा विदेशी बैकों में रखा जाता है। मैंने कोलकाता, कानपुर और मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंटों तथा उद्यमियों से बात की। इनके अनुसार नोटबंदी के बाद नंबर 2 का धंधा नकद में पूर्ववत चालू हो गया है। उद्यमी पेमेंट को कर्मियों के खाते में डालकर नकद निकाल कर रकम को काला बना रहे हैं। नकद में की गई बड़ी बिक्री छोटे-छोटे बिलों में काटी जा रही है।

कैशलेस के पक्ष में दिए जाने वाले ये तर्क भ्रामक हैं। विकसित देश यह जानते हुए भी कैशलेस इकॉनमी की तरफ बढ़ रहे हैं। स्वीडन तथा डेनमार्क लगभग कैशलेस हो चुके हैं। नॉर्वे तथा दक्षिण कोरिया 2020 तक कैशलेस होने की तरफ बढ़ रहे हैं। इन देशों के कैशलेस बनने का कारण नकारात्मक ब्याज दर है। जापान के केंद्रीय बैंक के पास यदि आप आज 1000 येन जमा कराएंगे तो एक वर्ष बाद आपको 999 मिलेंगे। बैंक आपकी रकम को सुरक्षित रखने का 0.1 प्रतिशत नकारात्मक ब्याज वसूल करता है। ऐसी परिस्थिति में कैशलेस लाभप्रद हो सकता है। अपने यहां ऐसा होता तो 2,000 रुपये रिजर्व बैंक में जमा कराने पर पांच साल में आपको 1960 रुपये मिलते। नोट छापने का खर्च भी बचता।

भारत में ब्याज दरें सकारात्मक हैं इसलिए रिजर्व बैंक को जमा रकम पर ब्याज अदा करना होगा जो कि अर्थव्यवस्था पर बोझ होगा। दूसरे, अपने देश में असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है। अफगानिस्तान और सोमालिया जैसे देशों में अपराध नियंत्रण के लिए कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दिया गया है। परन्तु इससे वहां का असंगठित क्षेत्र दबाव में आया है। विकास दर गिरी है। विकास और रोजगार के अभाव में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ी हैं। अपने देश में भी ऐसा ही हो रहा है। तीसरे, अपने टैक्सकर्मी अतिभ्रष्ट हैं। यदि यह ईमानदार होते तो नंबर 2 का धंधा होता ही नहीं। उद्यमियों द्वारा इस तरह का धंधा इन कर्मियों का हिस्सा बांधने के बाद ही किया जाता है। नगद लेनदेन पर नकेल लगाने में इन कर्मियों को घूस वसूलने का एक और रास्ता मिल जाएगा। चौथे, भारत में सोने की ललक गहरी है। अतः नगद पर प्रतिबंध बढ़ने के साथ-साथ सोने की मांग बढ़ेगी। संपूर्ण विश्व में ऐसा ही हो रहा है। वर्ष 2006 में सोने की वैश्विक सप्लाई 3252 टन थी जो 2015 में बढ़ कर 4306 टन हो गई है। यह सप्लाई बड़ी मात्रा में भारत और चीन को जा रही है।

टैक्स सिस्टम सुधारें 
कैशलेस हमारे लिए उपयुक्त नहीं है। ब्याज दर सकारात्मक होने से रिजर्व बैंक पर बोझ बढ़ेगा। असंगठित क्षेत्र दबाव में आएगा। इसी में अधिकतर रोजगार बनते हैं। टैक्सकर्मियों का भ्रष्टाचार बढ़ेगा, जैसा बैंककर्मियों का नोटबंदी के दौरान देखा गया है। हमारे नागरिक सोने की खरीद अधिक करेंगे। यह रकम देश के बाहर चली जाएगी। अतः हमें विकसित देशों की कैशलेस चाल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। अपने देश में सरकारीकर्मियों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नकेल कसे बिना इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि एक स्वतंत्र जासूस व्यवस्था बनाए जो भ्रष्टकर्मियों को टैप करे। हर पांच वर्ष पर इनके कामकाज का जनता से गुप्त मूल्यांकन कराया जाए और अकुशलतम 10 प्रतिशत को बर्खास्त कर दिया जाए। इन भ्रष्ट कर्मियों के हाथ में कैशलेस इकॉनमी चोर को थानेदार बनाने जैसा है।

 ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैंNbt 


बूचड़खानों पर कार्रवाई मुस्लिम उत्पीड़न या पर्यावरण बचाव?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अवैध बूचड़खानों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है जिसका देशव्यापी विरोध इस आधार पर हो रहा है कि यह केवल एक विशेष समुदाय को हानि पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। कुछ खबरें यह भी बता रही हैं कि प्रदेश में पशुधन संख्या बढ़ने के बावजूद सरकार यह कदम उठा रही है। इससे योगी सरकार का उद्देश्य साफ झलकता है कि वह मुस्लिम समुदाय को कष्ट पहुंचाना चाहते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या इस मुद्दे का मापदंड केवल पशुधन संख्या है या इसके तार हमारे पर्यावरण के बिगड़ते हालात से भी जुड़े हैं?

पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ, सम्भल, अलीगढ़, आगरा और बुलंदशहर जैसे ज़िलों को मांस उत्पादन और निर्यात का बड़ा केन्द्र माना जाता है। लेकिन यह भी एक सच है कि प्रदेश में व्यापक तौर से अवैध बूचड़खाने भी चल रहे हैं जहां पर्यावरण नियमों का सरेआम उल्लंघन होता है। उदाहरण के तौर पर जब पिछले साल नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने रिपोर्ट मांगी तो केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक प्रदेश में 126 वैध बूचड़खाने थे जबकि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के हिसाब से केवल 58 इकाई थीं। सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार केवल 27 इकाइयों के पास प्रवाह उपचार संयंत्र (ऐफ्लुअंट ट्रीटमेंट प्लांट) की सुविधा थी।

पिछले साल एनजीटी में एक याचिका दायर की गई जिसमें कहा गया कि 2015 में यूपीपीसीबी ने 146 में से केवल 8 बूचड़खानों के आवेदनों को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दिया था। आरोप यह लगाया गया कि इसके बावजूद ज़मीनी हकीकत यह है कि बढ़ती उत्पादन की मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार चल रहा है। कटाई के बाद यह अवैध इकाइयां जानवरों के करकट का ऐसा अनुपचारित रिसाव छोड़ती हैं जो हमारे नालियों के रास्ते भूजल में जा मिलता है और अंतः गंगा और यमुना नदियों में भयंकर प्रदूषण फैलाता है। इसके अलावा इन इकाइयों में चल रही भट्टियों से जानवरों के हड्डी की चर्बी का हानिकारक धुआं हमारे वायुमण्डल को दूषित करता है।

हमारे देश में जहां मांस उत्पादन व्यापार में अनुमानित एक करोड़ से ज़्यादा जानवरों को वैध तरीके से मारा जाता है, उसमें उत्तर प्रदेश का सबसे ज़्यादा योगदान 19% है। कई जगहों पर वैध बूचड़खाने ज़्यादा काम ले लेते हैं जिसे वह छोटे-छोटे ठेकेदारों को दे देते हैं। यह ठेकेदार बंद कमरों में ही अपना काम करते हैं जहां वेन्टिलेशन (वायु-संचालन) और पानी निष्कासन के लिए सुविधाएं ना के बराबर होती हैं। जानवरों के बचे अवशेष को ऐसे ही नालियों में बहा दिया जाता है। वैसे तो प्रदेश में यह भी कानून है कि सारे जानवरों को बूचड़खाने भेजने के पहले उनके स्वास्थ्य की जांच होगी, लेकिन जब इन अवैध इकाइयों में मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं तो बाकि कानून के पालन की गुंजाइश कम ही लगती है।

आमतौर पर यह अनुमान लगाया जाता है कि एक भैंस का वजन करीब दो क्विंटल के बराबर होता है जिसमें कटाई के बाद करीब एक-चौथाई हिस्सा गंदा अवशेष होता है। यह अवशेष या तो बेच दिया जाता है या फिर नाली और खुले मैदानों में फेंक दिया जाता है जो पर्यावरण के लिए खतरनाक है। इसके कारण हैज़ा, डिसेंट्री, टाइफाइड और हुकवर्म जैसी बीमारियां फैलती हैं। आखिरकार जब लोग पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य को अनदेखा करते हैं तो उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है।

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सौ साल बाद चंपारण सत्याग्रह की याद

10 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी का पहली बार बिहार आगमन हुआ और 17 अप्रैल 1917 को उन्होंने निलहे गोरों के खिलाफ संघर्ष की अगुवाई शुरू की। बिहार आने से पहले ही गांधी इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि मुजफ्फरपुर स्टेशन पर उनके स्वागत में पंद्रह हजार से अधिक की भीड़ उमड़ी थी। गांधीजी के बिहार आगमन के 100 वर्ष पूरे होने पर बिहार सरकार शताब्दी समारोह का आयोजन कर रही है। गांधी शांति प्रतिष्ठान का भी इसमें अहम योगदान है। गांधी का पहली बार पटना आना अपने आप में इतिहास है लेकिन वहां पहुंचने का उनका उद्देश्य 17 अप्रैल की तिथि को बेहद खास बना देता है। वर्ष 1914 के बाद का समय चंपारण के किसानों के लिए लूट, जुल्म और शोषण का था। उन्हें अपनी जमीन पर अपने पसंद की फसल उगाने की आजादी नहीं थी। पश्चिम की औद्योगिक क्रांति के बाद वहां नील की मांग बढ़ जाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने भारतीय किसानों पर सिर्फ नील की खेती करने का दबाव डालना शुरू कर दिया था।
हालात का जायजा 
वर्ष 1916 में 21,900 एकड़ जमीन पर आसामीवार, जिरात औरतीनकठिया प्रथा लागू थी। चंपारण के रैयतों से मड़वन, फगुआही, दशहरी, सिंगराहट, घोड़ावन, लटियावन, दस्तूरी समेत लगभग 46 प्रकार के टैक्स वसूले जाते थे। वसूली का तरीका भी बर्बर था। क्षेत्र के किसान ऊंची आवाज में इसका विरोध तक कर पाने की स्थिति में नहीं थे।
लंबे समय से संघर्षरत क्षेत्रवासियों का सब्र अब टूट चुका था। 1916 में लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान बिहार के नेताओं ने गांधीजी से चंपारण की स्थिति का समाधान निकालने की अपील की। निलहों के खिलाफ चंपारण के ही किसान नेता राजकुमार शुक्ल की अगुवाई में चल रहे तीन वर्ष के संघर्ष के बाद 17 अप्रैल 1917 को गांधीजी ने इसे वृहत आंदोलन का रूप दिया। इस आंदोलन से न सिर्फ नील किसानों की समस्या का त्वरित हल निकला बल्कि सत्य के साथ आग्रह करने वाली यह घटना पूरे विश्व को सम्मोहित करने में सफल रही। सत्य, अहिंसा और प्रेम के संदेश ने फिरंगियों के विरुद्ध भारतीयों को तो एकजुट किया ही, देश से बाहर भी गांधीवादी क्रांति का प्रवाह तेज किया।
सत्य की राह पर चलकर असत्य का विरोध करने की प्रतिज्ञा गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में ही ले ली थी। वहां से लौटने के बाद उनका यह पहला महत्वपूर्ण कार्य था। लोगों से मिलने और समस्या की जड़ तक जाने के क्रम में उन्होंने कई छोटी-बड़ी सभाएं कीं, जिसके लिए धारा 144 के तहत शांति भंग के प्रयास का नोटिस भी उन्हें भेजा गया। ऐसे विरोध का सामना गांधी अफ्रीका में भी कर चुके थे लिहाजा यहां की घटनाओं का उन पर कोई असर नहीं हुआ। इस ऐतिहासिक संघर्ष में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, ब्रजकिशोर प्रसाद सिंह, आचार्य कृपलानी समेत चंपारण के कई नेताओं ने महत्वपूर्ण योगदान किया।
चंपारण के 2900 गांवों के लगभग 13,000 रैयतों की स्थिति का जायजा गांधी ने स्वयं लिया। संबंधित अधिकारियों से विमर्श कर उन्होंने इस दिशा में तुरंत कार्रवाई की मांग की। एक महीने के अंदर, जुलाई 1917 में एक जांच कमेटी का गठन हुआ और 10 अगस्त को तीनकठिया प्रथा समाप्त कर दी गई। मार्च 1918 आते-आते चंपारण अग्रेरियन बिल पर गवर्नर जनरल के हस्ताक्षर के साथ अन्य काले कानून भी रद्द कर दिए गए। इस घटना का राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन पर सकारात्मक असर हुआ। गांधी के बिहार आगमन का असर वहां की जर्जर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा। क्षेत्र में कई विद्यालयों की स्थापना की गई, जिससे शिक्षा क्रांति को गति मिली।
ऐतिहासिक दृष्टि से यही वह मौका था जब विश्व को सत्याग्रह का मजबूत हथियार हासिल हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन का यह सबसे मजबूत औजार बना, जिसमें दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से लोहा लेने की ताकत थी। गर्व की बात है कि बीसवीं शताब्दी में भारत समेत विश्व के कई राष्ट्रों के लिए गांधी के सत्याग्रही औजार धर्म और कर्तव्य का रूप ले चुके थे। चंपारण सत्याग्रह की सफलता से पूरा विश्व वाकिफ है। गांधी ने वहां जिन मुद्दों को अपने हाथों में लिया, वह पूरी दुनिया के लिए साझा थे। चंपारण के बाद 1918 में अहमदाबाद मिल के मजदूरों की समस्या और खेड़ा तथा बारडोली के किसानों के आंदोलन के बाद ऐसे सभी संघर्षों के समय गांधीजी को याद किया जाता रहा।
सिर्फ एक प्रतीक
आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो महसूस होता है कि गांधी भारतीय अस्मिता के प्रतीक मात्र रह गए हैं। उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे आज भी उपेक्षित हैं। किसान आज आत्महत्या को मजबूर हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उनकी फसल का कितना दाम उन्हें मिलेगा। मामले का दूसरा पक्ष यह है कि गांधीजी की विरासतों से जुड़ने का दावा न सिर्फ भारत की सभी राजनीतिक पार्टियां करती रही हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गांधी के योगदानों को सराहा जाता है। नेल्सन मंडेला, बराक ओबामा, दलाई लामा और आंग सान सू की जैसे बड़े नेता उन्हीं को अपना आदर्श मानते रहे हैं। लेकिन दुख की बात है कि भारत में गांधी अब केवल एक प्रतीक बनकर रह गए हैं। गांधी का अर्थ गोलाकार चश्मा, लाठी या फिर धोती का टुकड़ा नहीं, सर्व धर्म समभाव, सत्य, अहिंसा, बराबरी तथा सत्याग्रह है। यह भारत में गांधीजी के जमीनी संघर्ष का शताब्दी वर्ष है इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को उनके आदर्शों व सपनों का भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। चंपारण सत्याग्रह के लिए यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं (NBT)


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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